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देश की आजादी से पहले भारतीय मध्यवर्ग दो भागों में बंटा हुआ था। एक तरह का मध्यवर्ग अंग्रेजी राज में अपना हित साधने में लगा था, अंग्रेजों की गुलामी कर सुख-सुविधा जुटाना उसकी प्राथमिकता थी। दूसरी तरफ, एक ऐसा मध्यवर्ग था जो अपने देश की आजादी के बारे में सोच रहा था। वह अपने गुलाम देश के नागरिक को एक स्वतंत्र देश के नागरिक में बदल देने के लिए संघर्ष कर रहा था। इस तरह मध्यवर्ग में दो तरह की विचारधारा वाले लोग शामिल थे।

21वीं शताब्दी में भी मध्यवर्ग के दो चेहरे हें और उनकी भूमिका कमोबेश वही है। आज वैश्वीकरण ने मध्यवर्ग को प्रलुब्ध कर उसे अंग्रेजों की गुलामी से भी ज्यादा खतरनाक बंधनों में फंसा रखा है। उच्चवर्ग की देखा-देखी, लालच और कीमती वस्तुओं को हासिल करने की इच्छा ने मध्यवर्ग की सोचने-समझने की शक्ति प्रायः खत्म कर दी है। अब बहुत कम लोग बचे हैं जो अपने देश, समाज और अपने समय की समस्याओं को ठीक से समझते हैं और हस्तक्षेप करते हैं।

एक समय ऐसा था जब मध्यवर्ग ने बड़े-बड़े आंदोलनों से देश की आबोहवा बदलने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। लोग सादगी से भरे हुए थे, पाखंड से दूर। छात्र आंदोलनों में भी मध्यवर्ग से आए छात्र-छात्राओं की एक बड़ी भूमिका थी। दलित वर्ग के एक बड़े तबके ने सामान्य मध्यवर्ग के साथ कदमताल मिलाकर देश को वैचारिक रूप से संपन्न बनाने में  योगदान दिया। लेकिन वैश्वीकरण की व्यापक चमक-दमक ने सभी तबकों की मानसिकता पर अपना कब्जा कर लिया है, जिसे समझने की जरूरत है।

प्रिंट मीडिया, टीवी, सोशल मीडिया और अन्य जितने संचार-माध्यम हैं, सभी में कॉरपोरेट जगत की हिस्सेदारी है। वे अपने लोक लुभावन विज्ञापनों से लोगों को भ्रमित कर अपने उत्पादों की तरफ उन्हें आकर्षित करते हैं। मीडिया वैचारिक दृष्टि से उन्हें बौद्धिक रूप से अपंग बनाने का काम करता है।

मध्यवर्ग में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब वह किसी भी तरह अपनी विचारधारा को लेकर दृढ़ नहीं है। वह समाज के प्रति कोई जवाबदेही महसूस नहीं करता और फिर तेजी से धार्मिक पाखंडों की तरफ उन्मुख हुआ है।

आज बढ़ती विषमता और प्रभुत्ववाद के दौर में मध्यवर्ग अपनी व्यापक जिम्मेदारी से कतरा रहा है, जबकि खुद उसके अस्तित्व पर संकट है। इस संकट की आहट इतनी धीमी है कि लोग इसपर अभी तक उस तरह गंभीर नहीं हैं जिस तरह की गंभीरता की अपेक्षा की जाती है।

ऐसी स्थिति में जब सब कुछ बेचा जा रहा हो, पब्लिक सेक्टर को प्राइवेट सेक्टर में बदला जा रहा हो तब कला, संस्कृति और साहित्य पर खतरा मंडराएगा ही।

21वीं शताब्दी में कला, संस्कृति और साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन बनाकर रख दिया गया है। वैसे भी आज बहुत कम लोगों की रुचि गंभीर साहित्य में है। सभी फेसबुक जैसे प्लेटफार्म में अपनी रचनाओं की प्रस्तुति करके मुग्ध हैं। उन्हें देश, समाज और अपने तेजी से बदलते हुए विचारहीन समय से कोई सरोकार नहीं रह गया है।

हिंदी साहित्य की एक दुर्गति यह है कि कोई लेखक अपनी लिखी हुई रचना के अलावा दूसरे किसी को पढ़ना नहीं चाहता, न ही उसकी रुचि किताब और पत्रिकाएं खरीदने में है। दुर्भाग्य से आज कला, संस्कृति और साहित्य में मध्यवर्ग की रुचि उस तरह नहीं रह गई है, क्योंकि अब मध्यवर्ग का पूरा ध्यान और उसकी सोच भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में लगी है। टीवी और मोबाइल फोन की दुनिया में वे इतने अधिक व्यस्त हैं कि उन्हें किताबों की तरफ झांकने के लिए फुर्सत नहीं है।

मध्यवर्ग में आज विचारों की कमी है। इस परिदृश्य में इसपर विचार करने की जरूरत है कि उसके पुनरुत्थान की संभावना कितनी है।

आज हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है, वह केवल अपने लिए जीना चाहता है। आज विरले ही कुछ व्यक्ति या साहित्यकार होंगे जो मुक्तिबोध की तरह अपने आप से यह प्रश्न पूछने का साहस करेंगे : अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया/ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम/मर गया देश, अरे, जीवित रहे गए तुम!

ऐसी चुनौतियों के बीच मध्यवर्ग को समस्याओं और संभावनाओं के बारे में नए सिरे से कुछ सोचना हमें जरूरी लगता है।

सवाल

(1)वैश्वीकरण का मध्यवर्ग पर किस तरह का असर पड़ा है, क्या मध्यवर्ग किसी बड़े संक्रमण से गुजर रहा है?
(2)देश की स्वाधीनता के पहले के और 21वीं सदी के भारतीय मध्यवर्ग में क्या बुनियादी फर्क हैं?
(3)बढ़ती विषमता तथा केंद्रीय सत्ताओं में मध्यवर्ग की घटती हिस्सेदारी के कारण उसके अस्तित्व पर कैसा संकट उपस्थित है?
(4)आप कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में मध्यवर्ग की रुचियों में क्या परिवर्तन लक्षित कर रहे हैं?
(5)क्या भारतीय मध्यवर्ग के पुनरुत्थान की कोई संभावना है?